Monday, 15 June 2015

Kabir Das ke Dohe in Hindi
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

कबीर दास जी के दोहे

 बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.
 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.
 साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे.
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
अर्थ : कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है. यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
अर्थ : मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु  आने पर ही लगेगा !
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
अर्थ : कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती. कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या  फेरो.
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर्थ : सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए. तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का.
दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।
अर्थ : यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह  दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत.
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
अर्थ : जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है. लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
अर्थ : न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है.
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
अर्थ : जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।
अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं
लगता.
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.
अर्थ : इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो !
हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए, मरम न कोउ जाना।
अर्थ : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है. इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

New Kabir Das Dohas Added

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन.                                                                                                  कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन.
अर्थ : कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया. कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है. 
कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई.                                                                                                          बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई.
अर्थ :कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए. बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है. इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।
जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई.                                                                                                    जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई.
अर्थ : कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो  गुण की कीमत होती है. पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है.
कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस.                                                                                                     ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस. 

अर्थ : कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है. मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले.
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात.                                                                                                                एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात.
अर्थ : कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है।जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी.
हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास.                                                                                                              सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास.
अर्थ : यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं. सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है. —
जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।                                                                                                              जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।
अर्थ : इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा. जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा.
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.                                                                                                         खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद.
अर्थ : कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है.
ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस.                                                                                                                     भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस.
अर्थ : कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न  मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता.  —
संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत                                                                                                        चन्दन भुवंगा बैठिया,  तऊ सीतलता न तजंत।
अर्थ : सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता. चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता.
 कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ.                                                                                                        जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ.
अर्थ :कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है.
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई.                                                                                                           सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ.
अर्थ : शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं.
कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय.                                                                                                                  सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय.
अर्थ : कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए. सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा.
 —
माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर.                                                                                                       आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर .
अर्थ : कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन. शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं.
  
मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई.                                                                                                          पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई.
अर्थ : मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा.
 
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही |
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ||
अर्थ : जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया  – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया.
 
कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी |
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ||
अर्थ : कबीर कहते हैं – अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो.सजग होकर प्रभु का ध्यान करो.वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है – जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?
 
आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत |
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||
अर्थ : देखते ही देखते सब भले दिन – अच्छा समय बीतता चला गया – तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई – प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं
 
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥
अर्थ : रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? एक कौड़ी –

कबीर दास जी के दोहे

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥
अर्थ : कबीर दास जी कहते हैं कि दुःख के समय सभी भगवान् को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं करता। यदि सुख में भी भगवान् को याद किया जाए तो दुःख हो ही क्यों !
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥
अर्थ : कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमे बस मेरा गुजरा चल जाये , मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूँ और आने वाले मेहमानो को भी भोजन करा सकूँ।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब ॥
अर्थ : कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और और जो आज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे !!
लूट सके तो लूट ले,राम नाम की लूट ।
पाछे फिर पछ्ताओगे,प्राण जाहि जब छूट ॥
अर्थ : कबीर दस जी कहते हैं कि अभी राम नाम की लूट मची है , अभी तुम भगवान् का जितना नाम लेना चाहो ले लो नहीं तो समय निकल जाने पर, अर्थात मर जाने के बाद पछताओगे कि मैंने तब राम भगवान् की पूजा क्यों नहीं की ।
माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।
माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख ॥
अर्थ : माँगना मरने के बराबर है ,इसलिए किसी से भीख मत मांगो . सतगुरु कहते हैं कि मांगने से मर जाना बेहतर है , अर्थात पुरुषार्थ से स्वयं चीजों को प्राप्त करो , उसे किसी से मांगो मत।


कबीर के दोहे अर्थ सहित: Kabir ke Dohe in Hindi With meaning
चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाए
वैद्य बिचारा क्या करे, कहां तक दवा खवाय॥

अर्थात चिंता ऐसी डाकिनी है, जो कलेजे को भी काट कर खा जाती है। इसका इलाज वैद्य नहीं कर सकता। वह कितनी दवा लगाएगा। वे कहते हैं कि मन के चिंताग्रस्त होने की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है, जैसे समुद्र के भीतर आग लगी हो। इसमें से न धुआं निकलती है और न वह किसी को दिखाई देती है। इस आग को वही पहचान सकता है, जो खुद इस से हो कर गुजरा हो।

*******************************
New RAHIM KE DOHE WITH HINDI MEANING

कबीर के दोहे अर्थ सहित: Kabir ke Dohe in Hindi With meaning

आगि जो लगी समुद्र में, धुआं न प्रगट होए।
की जाने जो जरि मुवा, जाकी लाई होय।।
फिर इससे बचने का उपाय क्या है? मन को चिंता रहित कैसे किया जाए? कबीर कहते हैं, सुमिरन करो यानी ईश्वर के बारे में सोचो और अपने बारे में सोचना छोड़ दो। या खुद नहीं कर सकते तो उसे गुरु के जिम्मे छोड़ दो। तुम्हारे हित-अहित की चिंता गुरु कर लेंगे। तुम बस चिंता मुक्त हो कर ईश्वर का स्मरण करो। और जब तुम ऐसा करोगे, तो तुरत महसूस करोगे कि सारे कष्ट दूर हो गए हैं।



*******************************

कबीर के दोहे अर्थ सहित: Kabir ke Dohe in Hindi With meaning

लेकिन कबीर प्रत्येक व्यक्ति को स्वावलंबी बनने का उपदेश देते हैं। कहते हैं :

करु बहियां बल आपनी, छोड़ बिरानी आस।
जाके आंगन नदिया बहै, सो कस मरै पियास।।
अर्थात मनुष्य को अपने आप ही मुक्ति के रास्ते पर चलना चाहिए। कर्म कांड और पुरोहितों के चक्कर में न पड़ो। तुम्हारे मन के आंगन में ही आनंद की नदी बह रही है, तुम प्यास से क्यों मर रहे हो? इसलिए कि कोई पंडित आ कर बताए कि यहां से जल पी कर प्यास बुझा लो। इसकी जरूरत नहीं है। तुम कोशिश करो तो खुद ही इस नदी को पहचान लोगे।

*******************************


कबीर के दोहे अर्थ सहित: Kabir ke Dohe in Hindi With meaning
कबीर एक उपाय और बताते हैं, कहते हैं कि सुखी और स्वस्थ रहना है तो अतियों से बचो। किसी चीज की अधिकता ठीक नहीं होती। इसीलिए कहते हैं :
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

*******************************

कबीर के दोहे अर्थ सहित: Kabir ke Dohe in Hindi With meaning
इस चंचल मन के स्वभाव की विवेचना करते हुए कबीर कहते हैं, यह मन लोभी और मूर्ख हैै। यह तो अपना ही हित-अहित नहीं समझ पाता। इसलिए इस मन को विचार रूपी अंकुश से वश में रखो, ताकि यह विष की बेल में लिपट जाने के बदले अमृत फल को खाना सीखे।
कबिरा यह मन लालची, समझै नहीं गंवार।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।
कबिरा मन ही गयंद है, आंकुष दे दे राखु ।
विष की बेली परिहरी, अमरित का फल चाखु ।।


आज के ज़माने मे भी कबीर जी उतने ही प्रासंगि 25; है जितने वो अपने समय मे थे. उनकी बाते जितनी गहराई लिये हुए है उतनी ही विस्तार भि.उन्कि बाते समझने के लिये खुले दिमाग के साथ साथ कड़वी और सच्ची बात सुनने की हिम्मत भी चहिये. उनकी बाते स्थापित मान्यताओ पर तो चोट करती ही है ,साथ साथ विचार के नये आयाम को जन्म देती है.
 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचाê 4; ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.

 साê 3;ु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-&# 2360;ार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
अर 81;थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे.

ति 44;का कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
अर्थ : कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे&nbs p;पांवों के नीचे दब जाता है. यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

धीरे-धीर 375; रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
अर्थ : मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानì 8; से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु  आने पर ही लगेगा !

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
अर्थ : कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती. कबीर की ऐसे व्यकî 1;ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या  फेरो.

जाê 0;ि न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर 81;थ : सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए. तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का.

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपन 375; याद न आवई, जिनका आदि न अंत।
अर्थ : यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह  दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत.

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
अर्थ : जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनê 0; करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है. लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.

बोल 68; एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रê 0;्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
अर्थ : न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है.

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
अर 81;थ : जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.

दुर्ल 49; मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
340;रुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।
अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-ब 66;र नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं
लगता.
&nb sp;
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.
अर्थ : इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो !

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आप 360; में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए, मरम न कोउ जाना।
अर् 41; : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्ë 1;ारा है. इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, सबकी मांगे खैर.
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर.

MEANING IN HINDI

कबीर कहते हैं की सबके बारे में भला सोचो . ना किसी से ज्यादा दोस्ती रखो और ना ही किसी से दुश्मनी रखो.

MEANING IN ENGLISH

Kabir says that you should always think well of everyone. Do not be over-friendly with anyone nor should you be hostile to anyone.

कहे कबीर कैसे निबाहे , केर बेर को संग
वह झूमत रस आपनी, उसके फाटत अंग .

MEANING IN HINDI

कबीर कहते हैं कि भिन्न प्रकृति के लोग एक साथ नहीं रह सकते. जैसे केले और बेर का पेड़ साथ साथ नहीं लगा सकते. क्योंकि हवा से बेर का पेड़ हिलेगा और उसके काँटों से केले के पत्ते कट जायेंगे.

MEANING IN ENGLISH

Kabir says people of different nature can not live together. As if Banana and Ber trees are planted near each other, Ber tree will swing in air and banana tree leaves will get torn by it's thorns.

पाथर पूजे हरि मिले , तो मैं पूजू पहाड़ .
घर की चाकी कोई ना पूजे, जाको पीस खाए संसार

MEANING IN HINDI

कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर कि मूर्ती कि पूजा करने से भगवान् मिल जाते तो मैं पहाड़ कि पूजा कर लेता हूँ .
उसकी जगह कोई घर की चक्की की पूजा कोई नहीं करता , जिसमे अन्न पीस कर लोग अपना पेट भरते हैं .

MEANING IN ENGLISH

Kabir says people worship idols made from stone. If it was possible to reach God this way, he would worship a Hill.
Instead, noone worships home flour mill (chakki) which gives us the flour to eat.



दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय |
मरी खाल की सांस से, लोह भसम हो जाय ||

MEANING IN HINDI

कबीर जी कहते हैं किसी को दुर्बल या कमज़ोर समझ कर उसको नहीं सताना चाहिए, क्योंकि दुर्बल की हाय या शाप बहुत प्रभावशाली होता है. जैसे मरे हुए जानवर की खाल को जलाने से लोहा तक पिघल जाता है.

MEANING IN ENGLISH

Kabir says that you should not oppress somebody weak thinking that person cannot do you any harm. Weak person's curse can do you great harm just like hide from a dead animal can melt even iron.


तिनका कबहूँ न निंदिये जो पावन तर होए
कभू उडी अँखियाँ परे तो पीर घनेरी होए

MEANING IN HINDI

कबीर कहते हैं कि किसी तिनके को पावों के नीचे नहीं रौंदना चाहिए अर्थात किसी दुर्बल, असहाय के ऊपर अत्याचार नहीं करना चाहिए क्योंकि जब दुर्बल उठ के वार करेगा तो बहुत पीड़ा  होगी, जैसे तिनका यदि आँख में उड़ के चला जाए तो बहुत व्यथा होती है.

MEANING IN ENGLISH

Kabir says that you should not oppress the weak, as you should not trample a speck because when that weak person counter-attacks , it will be very painful just like a speck of dust in eye can cause a lot of discomfort.


बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

MEANING IN HINDI

कबीर कहते हैं, कि सिर्फ बड़े होने से कुछ नहीं होता. उदाहरण के लिए खजूर का पेड़, जो इतना बड़ा होता है पर ना तो किसी यात्री को धूप के समय छाया दे सकता है, ना ही उसके फल कोई आसानी से तोड़ के अपनी भूख मिटा सकता है .

MEANING IN ENGLISH

It is no use being very big or rich if you can not do any good to others. For example, Palm tree is also very tall, but it is of no use to a traveller as it provides no shade and the fruit is also at the top, so noone can eat easily.

साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥

MEANING IN HINDI

कबीर कहते हैं, कि हे भगवान् मुझे ज्यादा नहीं चाहिए. बस इतना दीजिये,जिस में उसके परिवार का भरण-पोषण हो जाए. और यदि कोई अतिथि आये, तो उसका सत्कार भी कर सके.

MEANING IN ENGLISH

Kabir request God to give only as much so that he can feed his family and if any guest comes he should be able to feed him too. It means, you should only have what you need, no use having too much.

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय । 
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

MEANING IN HINDI

मिटटी कुम्हार से कहती है कि आज तो तू मुझे पैरों के नीचे रोंद रहा है . पर एक दिन ऐसा आएगा जब तू मेरे नीचे होगा और मैं तेरे ऊपर होउंगी . अर्थात मृत्यु के बाद सब मिटटी के नीचे ही होते हैं .

MEANING IN ENGLISH

Soil tell the pot maker, you think you are kicking me and kneading me with your feet. There will be a day when you will be below me (after death) , I will knead you. 

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । 
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

MEANING IN HINDI

ये उन लोगों के ऊपर कटाक्ष है जो धर्मभीरु होते हैं. कबीर कहते हैं कि माला फेरने से कुछ नहीं होता. धर्मभीरुता छोड़ के अपने मन को बदल.

MEANING IN ENGLISH

This is sarcasm on people who follow religion blindly. Kabir says, you spent your life turning the beads of rosary, but could not turn your own heart. Leave the rosary and try and change the evil in your heart.




Tinka kabahu na nindiye, paav tale jo hoye
Kabahu udd aankho pade, peed gehri hoye
तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीड गहरी होय ॥
One should not abuse a blade of grass under one's feet. If that happens to strike on one's eye then there will be terrific pain.



Shram se hi sab kuch hot hai, bin shram mile kuch nahi
Seedhe ungli ghee jamo, kabsu nikase nahi
श्रम से ही सब कुछ होत है, बिन श्रम मिले कुछ नाही |
सीधे ऊँगली घी जमो, कबसू निकसे नाही ||
Efforts can accomplish everything. Nothing can be accomplished without taking efforts. A purified butter that is frozen cannot be taken out with a straight finger



Mana unmana na toliye, shabd ke mol na tol
Murakh log na jansi, aapa khoya bol
मन उन्मना न तोलिये, शब्द के मोल न तोल |
मुर्ख लोग न जान्सी, आपा खोया बोल ||
When your mind is raged then you should not react to the words. One does not have any means for the valuation and weight of words. The fools do not understand this and lose their balance while talking



Pehle shabd pehchaniye, pichhe kije mol
Parkhi parkhe rattan ko, shabd ka mol na tol
पहले शब्द पहचानिये, पीछे कीजे मोल |
पारखी परखे रतन को, शब्द का मोल ना तोल ||
First you should understand what has been said by others. Then you can make the valuation of the words that you have listened. A goldsmith can test the purity of gold. One does not have any means for the valuation and weight of words.


Naari purush sab hi suno, yeh satguru ki saakh
Vish phal phale anek hai, mat dekho koi chaakh
नारी पुरुष सब ही सुनो, यह सतगुरु की साख |
विष फल फले अनेक है, मत देखो कोई चाख ||
Listen everybody to the preaching of a good preacher. There are many ways of sensual enjoyment. But one should abstain from any such way



Shabd barabar dhan nahi, jo koi jaane bol
Heera to damo mile, shabd mol na tol
शब्द बराबर धन नहीं, जो कोई जाने बोल |
हीरा तो दामो मिले, शब्द मोल न टोल ||
He who is good at speaking understands that there is no wealth like
words. A diamond can be purchased for a value. One do not just
have any means for valuation of word




Padha suna seekha sabhi, miti na sanshay shool
Kahe kabir kaso kahu, ye sab dukh ka mool
पढ़ा सुना सीखा सभी, मिटी ना संशय शूल |
कहे कबीर कैसो कहू, यह सब दुःख का मूल ||
One may read, listen and learn everything. But after doing all this he has confusion. Kabir is at pains to explain that confusion is the root of sorrow



Vishaya tyag bairaya hai, samata kahiye gyan
Sukhdayi sab jeev so, yahi bhakti parmaan
विषय त्याग बैराग हैसमता कहिये ज्ञान 
सुखदाई सब जीव सोंयही भक्ति परमान 
Being detached means renouncing the sensual pleasures.
Knowledge means equanimity. Devotion means creating happiness
for all the beings.




Parnaari ki rachnao, jo lehasun ki khani
Khoone besir khaiy, pragat hoye deewani
परनारी का राचणौजिसकी लहसण की खानि ।
खूणैं बेसिर खाइयपरगट होइ दिवानि ॥
A desire for other's wife is like a mine of garlic. A person can eat garlic hiding from all. But the fact of his having consumed garlic is clear to anyone who meets him
परनारी का साथ लहसुन खाने के जैसा है, भले ही कोई किसी कोने में छिपकर खाये, वह अपनी बास से प्रकट हो जाता है ।
भगति बिगाड़ी कामियाँ, इन्द्री केरै स्वादि ।



Kabira darshan sadhu ke, karat na kije kani
Jo udham se lakshmi, aalas man se hani
कबीर दर्शन साधु के, करत ना कीजै कानि ।
जो उधम से लक्ष्मी, आलस मन से हानि ॥
MEANING
Dont shirk to meet a good person. An intoxicated or lethargic mind
causes loss of wealth



Hari ras peeya jaaniye, kabahu na jaaye khumaar.
Maimanta ghoomat phire, naahee tan ke saar.
हरी रस पीया जानिये, कबहू न जाए खुमार |
मैमता घूमत फिरे, नाही तन की सार ||
MEANING
How will you know who is a GOD-realized soul, who has tasted the great wine, the
nectar of GOD?? Kabir says you can see the symptoms – the person who has attained the
community with GOD, looks like intoxicated all the time. This intoxication never comes
down, he looks like insane, wanders like the same, doesn’t even bother about his body or
appearance.





Ghat kaa pardaa kholkar, sanmukh de deedaar.
Baal sanehi saaiyaa, awe ant kaa yaar.

घट का परदा खोल कर, सन्मुख दे दीदार |
बाल स्नेही साईंयां, आवे अंत का यार ||
MEANING
He opens the veil within your being and shows himself  in front of you!! HE only is our true friend. At the time of our birth (here it refers spiritual birth or the moment when this creation came in existence and we as separate being came into picture) he was the only friend and when the journey of the soul has come to an end, I see him only as true friend. he has been our friend throughout our all lives, only it took whole journey from the origin to coming down this material world and going back to our source to make us realize this truth!!




Had mein chale so maanava, behad chale so saadh
Had behad dono taje, taako bata agaadh
हद में चले सो मानव, बेहद चले सो साध |
हद बेहद दोनों तजे, ताको बता अगाध ||
The one who is confined in limitations is human, the one who roams into unlimited, is a Sadhu. The one who has dropped both limited and unlimited, unfathomable is his being and understanding.




Jaap mare, ajapaa mare, anahad hu mari jaye
Ram snehi na mare, kahe Kabir samjhaye
जाप मरे, अजापा मरे, अनहद हू मरी जाय |
राम स्नेही ना मरे, कहे कबीर समझाय ||
MEANING
The nector of love makes us immortal


Jis marne se jag dare, mere man mein anand
Kab maru kab paon, puran parmanad
जिस मरने से जग डरे, मेरे मन में आनंद |
कब मरू कब पाऊ, पूरण परमानन्द ||
The whole world fears death, but death will be full of bliss for me
I am waiting for death which will merge me, into absolute bliss



दोहा:- हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मरे, मरम न जाना कोई।
अर्थ : कबीर दास जी कहते है कि हिन्दुओं को राम प्यारा है और मुसलमानों (तुर्क) को रहमान| इसी बात पर वे आपस में झगड़ते रहते है लेकिन सच्चाई को नहीं जान पाते |
दोहा:- काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
     पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगो कब |
अर्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी करो| जीवन बहुत छोटा होता है अगर पल भर में समाप्त हो गया तो क्या करोगे|

दोहा:- धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
     माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय|
अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि हमेशा धैर्य से काम लेना चाहिए| अगर माली एक दिन में सौ घड़े भी सींच लेगा तो भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेंगे|
दोहा:- निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय
     बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय|
अर्थ:- कबीर जी कहते है कि निंदा करने वाले व्यक्तियों को अपने पास रखना चाहिए क्योंकि ऐसे व्यक्ति बिना पानी और साबुन के हमारे स्वभाव को स्वच्छ कर देते है|
दोहा:- माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख
माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख|
अर्थ:- कबीरदास जी कहते कि माँगना मरने के समान है इसलिए कभी भी किसी से कुछ मत मांगो|
दोहा:- साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय
     मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय|
अर्थ:- कबीर दास जी कहते कि हे परमात्मा तुम मुझे केवल इतना दो कि जिसमे मेरे गुजरा चल जाये| मैं भी भूखा न रहूँ और अतिथि भी भूखे वापस न जाए|

दोहा:- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय
     जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय|
अर्थ:- कबीर कहते कि सुख में भगवान को कोई याद नहीं करता लेकिन दुःख में सभी भगवान से प्रार्थना करते है| अगर सुख में भगवान को याद किया जाये तो दुःख क्यों होगा|

दोहा:- तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कभी भी पैर में आने वाले तिनके की भी निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकिं अगर वही तिनका आँख में चला जाए तो बहुत पीड़ा होगी|
दोहा:- साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं
     धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं।
अर्थ:- कबीर दास जी कहते कि साधू हमेशा करुणा और प्रेम का भूखा होता और कभी भी धन का भूखा नहीं होता| और जो धन का भूखा होता है वह साधू नहीं हो सकता|
दोहा:- माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
अर्थ:- कबीर जी कहते है कि कुछ लोग वर्षों तक हाथ में लेकर माला फेरते है लेकिन उनका मन नहीं बदलता अर्थात् उनका मन सत्य और प्रेम की ओर नहीं जाता| ऐसे व्यक्तियों को माला छोड़कर अपने मन को बदलना चाहिए और सच्चाई के रास्ते पर चलना चाहिए|
दोहा:- जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय।
अर्थ:- कबीर दास जी कहते है अगर हमारा मन शीतल है तो इस संसार में हमारा कोई बैरी नहीं हो सकता| अगर अहंकार छोड़ दें तो हर कोई हम पर दया करने को तैयार हो जाता है|
दोहा:- जैसा भोजन खाइये , तैसा ही मन होय
     जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय।
अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि हम जैसा भोजन करते है वैसा ही हमारा मन हो जाता है और हम जैसा पानी पीते है वैसी ही हमारी वाणी हो जाती है|
दोहा:- कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार
     साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।
अर्थ:- बुरे वचन विष के समान होते है और अच्छे वचन अमृत के समान लगते है|
दोहा:- जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ
     मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ|
अर्थ:- जो जितनी मेहनत करता है उसे उसका उतना फल अवश्य मिलता है| गोताखोर गहरे पानी में जाता है तो कुछ ले कर ही आता है, लेकिन जो डूबने के डर से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं वे कुछ नहीं कर पाते हैं|


2 comments: